मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

मारवाडी कविता

कड़ै रै माँ की गोदी खूगी
काँधे खूगे बाबू के""
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मांगे धनपत लखमीचन्द के,,,
सांग देखण जाया करते...
ब्याह सगाई रिश्ते,,,
नाई बामण करकै आया करते...
नीम जाल के रूखां पै चढ़,,,
पील नींबोली खाया करते...
बाबू छो मै आजाता तो,,,
दिखै दामण मैं लुक जाया करते...
डंडा बित्ती डला लकोई,,,
खेल होवैं थे जादू के...
कड़ै रै माँ की गोदी खूगी,,,
खूगे कांधे बाबू के...
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ब्याह शादी मैं बानै बिठाणा,,,
ला ला कै मटणा नुहाणा...
भाभी पै श्याही घलवाणा,,,
रूसे कुण्बे नै मनाणा...
गाल मैं बैठ पत्तल पै खाणा,,,
नाई कै वो मोड़ बंधाणा...
बनड़े कै फेर तेल चढ़ाणा,,,
बुआ भाण का मंगल गाणा...
साइज़ छोटे बणगे रै इन,,,
भातियां आले लाडू के...
कड़ै रै माँ की गोदी खूगी,,,
खूगे कांधे बाबू के...
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कुणबा कठ्ठा होकै नै,,,
फेर करण लामणी जाणा रै...
रैड़ू गाडी भर कै लाण की,,,
गेर पैर मैं गाणा रै...
ल्याकै तिपाई चढ़ ऊपर,,,
फेर छाबड़ी ले बरसाणा रै...
भूरली तारण खातर उसपै,,,
मांझण का लहराणा रै...
टूटी जूती पाटा कुरता,,,
बटण टूट रे बाजू के,,,
कड़ै रै माँ की गोदी खूगी,,,
खूगे कांधे बाबू के...
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चार पहर तै पहले उठ कै,,,
हल जोड़ कै भाणा रै...
ठा कै झाला घाल ज्वारा,,,
रोटी ले कै जाणा रै...
घी के पीपे भरे रवैं थे,,,
शक्कर गेल्यां खाणा रै...
म्हैंस खोल पहल्यां नै झोड़ पै,,,
गोते मार नहणा रै...
आग लाग गी म्हैंस भाज गी,,,
खागे गेहूं # छाजू के...
कड़ै रै माँ की गोदी खूगी,,,
खूगे कांधे बाबू के...
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बणा कै टोली धर कै दोघड़,,,
गीत गांदी जाया करती...
तड़कै सांझा गालां के मैं,,,
रोणक सी बण जाया करती...
होक्का भर कै बैठ गये,,,
ओड़ै बात ज्ञान की पाया करती...
ब्याही थ्याही नई भोड़िया,,,
घूंघट मैं शरमाया करती...
सामण कातक फागण के वै,,,
गीत गांदी भादू के...
कड़ै रै माँ की गोदी खूगी,,,
खूगे कांधे बाबू के...
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कोहणी कै बंधी नेजू बाल्टी,,,
कुवे पै पनिहारी देखी...
सीपी चिमटा पलटा बेचती,,,
हामनै गाडे लुहारी देखी...
कापण कुलिया मटका बिलोणी,,,
दाणा मैं देंदी कुम्हारी देखी...
Rohilla Ji नै या,,,
बदलती दुनियादारी देखी...
कोए कहे की मानै ना,,,
यें बालक रहे ना काबू के...
कड़ै रै माँ की गोदी खूगी,,,
खूगे कांधे बाबू के...।।

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