मंगलवार, 21 जून 2016

Kahani aik aatma ki

इतना भी न सताओ की भूत बनकर सताना पड़े
कभी-कभी क्या, हमेशा ही ऐसा होता है मेरे साथ। जब भी इंसान के बारे में सोचता हूँ तो गुस्से से तिलमिला उठता हूँ। कभी हँसना तो कभी रोना आता है इस इंसान पर। बड़ी-बड़ी बातें करने वाला इंसान, नैतिकता की दुहाई देने वाला इंसान, राम-कृष्ण का पुजारी, माँ शक्ति की चरणों में लेटे रहने वाला इंसान। वाह प्रभु, तू ने क्या इंसान बनाया। मुझे तो लगता है कि जब प्रभु ने सब जीवों को बना लिया होगा तो उसके बाद इंसान बनाया होगा ताकि उसकी सृजनता चरितार्थ हो सके। पर क्या उसकी सृजनता मानव के रूप में साकार हो पाई? मुझे तो लगता है कि बिलकुल नहीं। क्यों कि जब तक इस दुनिया में इंसान नहीं आया होगा तब-तक सभी जीव शांति से जी रहे होंगे और इंसान के आते ही उनकी ही क्या, भगवान की शांति भी भंग हो गई होगी।
आपको लगता होगा कि मैं कौन हूँ, और क्यों इतना बकबका रहा हूँ। चलिए बता ही देता हूँ, मैं भी तो इंसान ही बनकर इस जमीं पर आई थी, बहुत सारे सपने थे मेरे, पर इंसान ने ही, अरे इंसान क्या मेरे अपनों ने ही मेरे सारे सपनों में आग लगा दी और लगा दी आग मुझे भी, क्योंकि वे तो इस कहावत में विश्वास करते थे कि ना रहेगा बाँस, ना बजेगी बाँसुरी। जो मेरे नजरों में प्रभु की अनमोल कृति थी, वही उनके नजरों में विपत्ति। और वे लोग तो विपत्ति का समूल नाश करने में ही विश्वास रखते थे।
यह कहानी भले आपको काल्पनिक लगे, पर यह सच्ची कहानी है। आप इस कहानी के ताने-बाने पर मत जाइए, मैं तो इस कहानी की सत्यता से आप लोगों का परिचय कराना चाहती हूँ। जी हाँ आप ठीक समझे, मैं भी इंसान ही हूँ पर नारी हूँ। मैं चीख-चीख कर अपनों से अपनों की भीख माँगती रही पर किसी भी दरिंदे के कान पर जूँ तक नहीं रेंगा और अंततः मुझे इन जालिमों से निपटने के लिए खुद ही जालिम बनना पड़ा, दरिंदगी की हद तक जाना पड़ा। मैं मानती हूँ कि मैंने जो किया वह सही नहीं था पर क्या जो समाज ने, इंसान ने मेरे साथ किया, वह सही था????
मेरा जन्म आज से लगभग 70 साल पहले एक ऐसे गाँव में हुआ था जो धार्मिकता, मानवता की ध्वजा को लहराने वाला माना जाता था। उस समय मेरे गाँव में काली माई, बरमबाबा आदि देवथानों के साथ ही शिवजी का एक छोटा सा मंदिर भी था। घर-घर में माँ तुलसी शोभायमान थीं, सूरज के अस्ताचल में जाते ही इन बिरवों के नीचे मिट्टी के छोटे-छोटे कोरे दीपक जल उठते थे। ऐसे धार्मिकतापूर्ण वातावरण में मैं फली-फूली। विद्यालय का मुँह तो नहीं देखी पर घर पर ही एक कुशल शिक्षक के मार्गदर्शन में बहुत सारे विषयों का अध्ययन की। मुझे गीता और रामायण पढ़ना बहुत ही अच्छा लगता था। मुझे याद है मैं उस समय 14 साल की रही होगी तभी मेरे हाथ पीले कर दिए गए थे।
सादी के बाद मैं नए गाँव, घर-परिवार में आ गई। इस नए घर का माहौल ठीक-ठाक ही था। 2 सालों के बाद मैं एक बच्ची की माँ बन गई। पर मैं कुछ समझ पाती इससे पहले ही वह लड़की पता नहीं कहाँ गायब हो गई और मुझे यह बताया गया कि वह मरी हुई ही पैदा हुई थी, पर मुझे उसका रोता चेहरा आज भी याद है। मैं उस समय कुछ प्रतिकार नहीं कर पाई, क्योंकि घर-गाँव का माहौल ही कुछ ऐसा था कि मेरी सुनने वाला कोई नहीं था। मैं अपने मायके वालों से इस बारे में बात की पर वे लोग भी मेरा साथ नहीं दे पाए। खैर इस घटना को बीते लगभग 1 साल ही बीते थे कि फिर मैं एक बच्ची की माँ बनी। पर हाय रे प्रभु इस बच्ची का मुँह भी ठीक से मैं नहीं देख पाई। पता नहीं प्रभु को क्या मंजूर था। 1-1 वर्ष या 14-15 महीनों पर मैं लगातार बच्चे जनने वाली मशीन बनी रही, पर शायद ये बच्चे समाज, घर के किसी काम के नहीं थे।
एक-एक करके मेरी पुत्रियाँ इस हृदयहीन समाज में साँस लेने के पहले ही काल के गाल में समाती गईं। मुझे याद है लगभग 6-7 सालों में मुझे 5 पुत्रियाँ प्राप्त हुई थीं, पर कोई भी अंगने में किलकारी नहीं ले पाई थी। इनके मौत का राज मेरे लिए अबूझ पहेली था, और इस पहेली को सुलझाने वाला भी कोई नहीं था। अब तो जिस घर में मैं लक्ष्मी बनकर आयी थी, उसी में अब दरिद्रा हो गई थी। एक असहाय अबला। जिसे कोई भी दुरदुरा देता था। किससे कहूँ अपना दुख। खुद मेरे पति भी अब मुझे बात-बात पर मारने दौड़ पड़ते थे।
एक दिन की बात है, शाम का समय था और मेरे सास-ससुर दोगहे में बैठकर कुछ खुसुर-पुसुर कर रहे थे। पास ही में मेरे पति (अ+देव) भी बैठे हुए थे। उस दिन मैंने हिम्मत करके इन लोगों से कुछ कहने के लिए किवाड़ की ओट में खड़ी हुई। पर यह क्या अभी मैं कुछ कहने की हिम्मत करूँ इससे पहले ही मेरी सास ने मेरे पति से कहा कि ये कलमुँही केवल कलमुँही ही पैदा करेगी। यह जबतक है तेरी दूसरी शादी भी नहीं कर सकती। पर कुछ भी कर एक कुलदीपक दे ही दे मुझे। बिना कुलदीपक का मुँह देखे मैं कत्तई मरना नहीं चाहती। फिर अचानक मेरे पति ने कहा कि माँ धीरज रख। आज ही कुछ इंतजाम कर देता हूँ। मैं तो एकदम से डर गई थी क्योंकि उस समय ये मेरे अपने इंसान कम दरींदा अधिक लग रहे थे।
जिसका डर था वही हुआ। उसी रात मुझपर मिट्टी का तेल छिड़ककर आग के हवाले कर दिया गया। मैं चाहकर भी कुछ न कर सकी, बस केवल चिखती रही, चिल्लाती रही पर सुने कौन? अंततः मेरी इह लीला समाप्त हो गई। न पुलिस आई न गाँव के कुछ लोग। गाँव के कुछ लोग भी यही कहते रहे कि मैं कुलटा थी, मेरे उस घर में आते ही उस घर की खुशियाँ छिन गई थीं। पर क्या ऐसा था, मुझे पता नहीं। मेरे माता-पिता, भाई-बहन भी बस आँसू ही बहा पाए, कुछ कर नहीं पाए। मेरी आत्मा भटकती रही। कुछ महीनों बाद मेरे पति की दूसरी शादी भी हो गई। पर अब तो मैं पूरी तरह से इन कथित अपनों को सबक सिखाने का मन बना चुकी थी।
तो अब शुरु होता है मेरा बदला...........रमेसर काका और रमेसरी काकी आज बहुत परेशान नजर आ रहे थे। उनकी बहू रमकलिया पेट से थी और रह-रहकर कराह उठती थी। पता नहीं क्यों जब भी उसे गर्भ रहता तो उसे पेट में अत्यधिक दर्द शुरु हो जाता। इसके पहले भी उसके 2 भ्रूण नुकसान हो चुके थे। रमेसर काका का एक ही पुत्र था बहोरन। रमकलिया उसकी तीसरी पत्नी थी। दरअसल सुनने में यह आता है कि बहोरन की पहली पत्नी से लगभग 1-1 साल के अंतराल पर 5 पुत्रियाँ पैदा हुई थीं पर सभी मरी हुई और जिसके चलते अंततः बहोरन की पहली पत्नी अपने ऊपर मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा ली थी और सदा-सदा के लिए इस दुनिया का परित्याग कर दी थी। बहोरन की दूसरी बीबी से केवल दो लड़कियाँ ही थी पर पुत्र की लालसा में बहोरन के माता-पिता ने बहोरन की तीसरी शादी भी कर दी थी। गाँव की दाई की माने तो बहोरन की दूसरी बीबी भी जब एक बार पेट से थी और खरबिरउरा दवा आदि तथा उसके हाव-भाव से ऐसा लगता था कि पेट में लड़का ही है, तो उसे भी सहनीय पीड़ा होती रहती थी और अंततः उसका वह गर्भ भी नुकसान हो गया था। तो गाँव वालों को यह लगता था कि बहोरन की पत्नी को जब भी लड़का होने को होता है तो बहुत ही दर्द होता है और जब लड़की होने को हो तो आराम से हो जाता है। अब गाँव वाले इस बात को बहोरन की पहली पत्नी से जोड़कर देखते थे।
गाँव में धीरे-धीरे यह भी बात फैलना शुरु हो गई थी कि बहोरन की पहली पत्नी से जो भी पाँच लड़कियाँ पैदा हुई थीं, सबके सब ठीक थीं पर बहोरन काका और उनके घर वालों की मिलीभगत से उन मासूमों को सदा के लिए मिट्टी के नीचे दफना दिया गया था। क्योंकि वे लोग लड़का और सिर्फ लड़का चाहते थे। उन्हें कुलदीपक चाहिए था और उस कुलदीपक के चक्कर में इन लोगों ने शक्ति स्वरूपा कन्याओं को कंस बनकर हत्या कर दी थी। इतना घोर अनर्थ और फिर भी कोई प्रतिकार नहीं? अब तो गाँव वाले सदमे में रहते थे क्योंकि पेट से होने पर गाँव की कई बहुओं के साथ उल्टी-पुल्टी घटनाएँ घटना शुरु हो गई थीं।
खैर अब आपको रमेसर काका के घर में ले चलता हूँ। रमेसर काका की बहू रमकलिया अंगने में पड़ी कराह रही है, पास में गाँव की दाई और गाँव की 2-4 बुजुर्ग महिलाएँ बैठी हुई हैं। सब की सब उदास हैं। रमेसरी काकी रह-रहकर रोती हैं और भुनभुनाती हैं कि उनकी पहली बहू ही यह सब कर रही है। वे अचानक घर से बाहर निकलकर रमेसर काका से कहती हैं कि बहू को किसी अच्छे अस्पताल में भर्ती करा दीजिए। रमेसर काका सहमति में सर हिलाते हैं तभी दाई हड़बड़ाए हुए घर से बाहर निकलती है और रमेसरी काकी की ओर इशारे से कुछ कहती है। अच्छा तो रमेसरी काकी का यह कुलदीपक भी अब इस दुनिया में आने से रह गया।
एक दिन की बात है। रमेसरी काकी रात को खाट पर सोए-सोए ही चिल्लाने लगीं, छोड़-छोड़ मेरा गला। छोड़-छोड़। उनकी आवाज सुनकर रमेसर काका, बहोरन आदि उनके पास आ गए। उन लोगों ने देखा कि रमेसरी काकी खुद ही अपने हाथों से कसकर अपना गला पकड़ी हैं और चिल्लाए जा रही हैं। उनकी आँखें थोड़ी सी लाल हो गई थीं और चेहरे पर हल्की सी सूजन भी आ गई थी। बहोरन ने आगे बढ़कर रमेसरी काकी के गले से उनका हाथ मजबूती से खींचकर अलग किया। फिर रमेसरी काकी को उठाकर एक-दो घूँट पानी पिलाया गया। अब तो पूरे घर वालों के आँखों से नींद कोसों दूर चली गई थी। सभी सहमे हुए ही लग रहे थे क्योंकि रमेसरी काकी रूआँसू होकर कह रही थी कि बहोरनी की पहली बहू ही थी जो उनका गला दबा रही थी।
दरअसल रमेसरी काकी ने कहा कि आज शाम को जब वे गोहरौरी में से गोहरा निकाल रही थीं, तभी वहाँ उन्हें कोई दिखा था पर अचानक गायब हो गया था। दो मिनट में ही ऐसा लगा कि गोहरौरी में भूचाल आ गया हो और पूरी मड़ई हिलने लगी थी। मैं एकदम से डर कर सर पकड़कर बैठ गई थी। तभी एक औरताना कर्णभेदक हँसी मेरे कानों में पड़ी थी, जो बहुत ही डरावनी थी। बाद में वह हँसी आवाज में बदल गई थी और चिल्ला रही थी कि अगर मैं कलमुँही थी, मेरी बेटियाँ कलमुँही थीं तो तूँ यह कैसे भूल गई कि तूँ भी तो किसी की बेटी है, मैं भी बेटी, तूँ भी बेटी तो केवल मैं ही कलमुँही क्यों? तूं क्यों नहीं? तुझको कुलदीपक चाहिए ना, देती हूँ मैं तुझे कुलदीपक। इतना कहने के बाद वह आवाज फिर से हँसी में बदल गई थी और मैं बस अचेत मन, सहमे हुए वह आवाज सुनती रही थी। और अभी वही मेरा गला भी दबा रही थी।
प्रभु तो अगम है ही कभी-कभी कुछ ऐसी घटनाएँ भी घटित हो जाती हैं जो किसी अगम से कम नहीं होती। इंसान इनको चमत्कार मान लेता है या किसी गैर-इंसान का कार्य। क्योंकि इसके सिवा कोई चारा भी तो नहीं बचता। रमेसर काका के साथ ही उनका पूरा परिवार तथा उनका पूरा गाँव एक रहस्यमयी संभावित खतरे में जी रहा था। उनको लगता था कि कहीं कुछ तो ऐसा है जो जाने-अनजाने उनका अहित कर रहा है, परेशान कर रहा है उन्हें तथा उनके पूरे गाँव को। उनके ग्राम-प्रधान तथा अन्य घरों के बड़े-बुजुर्ग इस खतरे से पार पाने के लिए हाथ-पैर मार रहे थे पर की समाधान नहीं निकल पा रहा था। गाँव में अखंड किर्तन से लेकर कितने सारे पूजा-पाठ किए गए पर समस्याएं जस की तस। कितने ओझा-सोखा आए पर की समाधान नहीं।
एक दिन गाँव की एक औरत सुबह-सुबह अपने खेतों में गेहूँ काटने गई थी। अचानक उसे पता नहीं क्या हुआ कि विकराल रूप बनाए अपने गाँव में दाखिल हुई और बस एक ही रट लगाए जा रही थी, अब इस गाँव के किसी भी घर में कोई कुलदीपक नहीं आएगा, जो हैं भी, वे भी एक-एक करके काल की गाल में समा जाएंगे, मेरा भोजन बन जाएँगे, मैं किसी को भी नहीं छोड़ूगी, ए ही सब कहते-चिल्लाते वह ग्राम-प्रधान के दरवाजे पर पहुँचकर तपड़ी, “निकल परधान, बाहर निकल, उस दिन तूँ कहाँ था, जब मुझे और मेरी बेटियों को जिंदा ही दफनाया जा रहा था, जलाया जा रहा था, उस दिन तो तूँ, चैन की नींद सो रहा था, रहनुमा बना है न तूँ इस गाँव का....मेरी बात अब कान खोल कर सुन ले, न अब तूँ बचेगा और ना ही इस गाँव का कोई और। सबको तहस-नहस कर दूँगी। चुन-चुन कर बदला लूंगीं, अभी तक तुम लोगों ने एक मरी आत्मा का कहर नहीं देखा है, जो अब शुरु होने वाली है।” इतना सब कहने के बाद व औरत बेहोश हो गी, उसे उठाकर उसके घर पर लाया गया। धीरे-धीरे आधे-एक घंटे में व सचेत हुई।
अब तो उस चुड़ैल ने, भूतनी ने उस गाँव पर अपना कहर बरपाना शुरु कर दिया था। प्रतिदिन कोई न कोई ऐसी घटना घटने लगी जिसने गाँव वालों से उनका चैन छिन लिया। उनके आँखों की नींद सदा के लिए गायब होने लगी। वे लोग आतंक में जीने लगे। अरे यहाँ तक कि उस गाँव के छोटे-छोटे बच्चों को उनकी माँ के साथ किसी न किसी रिस्तेदारी में भेजा जाने लगा। ऐसा लगने लगा कि गाँव में पूरी तरह से आंतक का, भय का साम्राज्य पसर चुका है। सबके चेहरे पर खौफ साफ नजर आने लगा था। प्रतिदिन उस गाँव की महिलाएँ नहा-धोकर दल बनाकर छाक देने देवीताने जाने लगी थीं। कड़ाइयां भाखना शुरु हो गया था। देवताओं की आराधना दिन व दिन बढ़ती ही जा रही थी।
एक दिन रमेसर काका खेतों में मृत पाए गए थे। ऐसा लगता था कि किसी ने उनको तड़पा-तड़पाकर मारा हो। आधे कट्ठे तक की फसल उनके घसीटने के कारण बरबाद हो गई थी। उनके गले पर किसी के अंगुलियों के निसान उभर आए थे, जो बहुत ही भयावह थे। रमेसरी काकी भी एक दिन गोहरौरी में गोहरा निकालने गईं और वहीं एक जहरीले साँप ने उनकी इहलीला समाप्त कर दी। बहोरन पागल हो गया था। गाँव वालों की माने तो उसे किसी भूत ने अपने चपेट में लेकर पागल बना दिया था। वह एकदम पागलों जैसा इधर-उधर घूमता रहता और लोगों को परेशान किया करता। कभी-कभी उसमें इतना बल आ जाता की लोगों को दौड़ा-दौड़ाकर मारता और इतना मारता कि कुछ लोग अधमरे हो जाते। कभी-कभी तो दिन में भी लोगों के घरों के दरवाजे बंद रहते और कोई घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। बरबादी और सिर्फ बरबादी ही दिखाई देती थी उस गाँव में।
कुछ दिनों के बाद एक साधू का आगमन हुआ उस गाँव में। वे बहुत ही सीधे-साधे और धार्मिक स्वभाव के थे। गाँव वाले उनके आगे बहुत गिड़गिड़ाए और उनसे चिरौरी किए कि उन लोगों को इस आत्मा से बचा लिया जाए। साधू बाबा पहले तो स्थिति को अच्छी तरह से समझे और पूरे गाँव वालों को बहुत ही फटकार लगाई। अंत में उन्होंने कुछ अनुष्ठान किया और उस मृत आत्मा को एक औरत पर बुलाया। मृत आत्मा के आते ही वह औरत आपे से बाहर हो गई और उत्पात मचाना शुरु कर दिया फिर साधूबाबा के अनुरोध पर वह धीरे-धीरे शांत हुई और रो-रोकर कहने लगी कि बाबा, इन गाँववालों ने केवल मेरी ही पुत्रियों को नहीं और भी कितनी ही बेटियों को जिदें जी गाँव के बाहर के बगीचे के किनारे दफन कर दिया है। मैं किसी भी किमत पर इन लोगों को छोड़ने वाली नहीं। इस गाँव में कोई नहीं बचेगा। अंत में साधूबाबा ने बहुत अनुनय-विनय करके उस महिला को शांत कराया। फिर गाँव वालों ने स्वपन्न में भी ऐसी घिनौनी हरकत न करने की कसम खाई और साधू बाबा द्वारा एक छोटा अनुष्ठान किया गया। सभी मृतक बालाओं की शांति के मंत्रोच्चार किए गए।
अभी तो वह गाँव पूरी तरह से शांत है पर अभी भी गाँव में और गाँव के बाहर एक अजीब सन्नाता पसरा रहता है। गाँव के बाहर निकलने पर आज भी ऐसा लगता है कि कोई महिला अपनी छोटी-छोटी बेटियों के साथ रो रही है। और कहीं न कहीं गाँव वालों को अपनी करतूत का भान करा रही है। आज भी मायूस है वह गाँव और वहाँ के लोग। “बेटी है तो कल है, बेटी है तो जीवन है।“
समाप्त

सोमवार, 20 जून 2016

vishwas kya hai,kyo jaruri hai

आज के युग मे विश्वास करने योग्य कोई नहीं है ऐसा कहा जाता है,
यह समाज के लिए देश के लिए भयावह स्थ्ति है, जीवन से यदि विश्वास ही खत्म हो जाएगा तो बचा क्या है? जीवन के इसी के विश्वास के भरोसे से ही बहू ससुर के साथ रहती है,बेटे का भरोसा इसका संबल है।
हर उस स्थान पर भरोसा टूट रहा है ? यह काम हो जाएगा विश्वसनीयता के साथ कहा जाता है? काम नहीं होता, फिर इस विश्वसनीयता का क्या हश्र होगा? बेटी का भरोसा बाप नहीं होगा तो कोन होगा? बेटी ही विश्वास घात का शिकार होती है, पति पत्नी भी इसी घात के शिकार होते है, यही घात कुछ भी करा सकता है? एक दूसरे से हमेशा के लिए जुदा करने का यही कारण है। जीवन अद्भुत है, बेटा माँ से इसी की परीक्षा लेता है ? शिक्षक ही विद्यार्थी बन जाय इससे बड़ा महा पाप क्या हो सकता है, यही हो रहा है, मित्र का मित्र पर भरोसा नहीं, मालिक का नौकर पर भरोसा नहीं है, नौकर, मालिक आड़े वक्त मे काम आएगा इसका विश्वास नहीं है, कही पर भी किसी को किसी का विश्वास नहीं है, बेटा बाप को हार मे साथ देगा मानता नहीं है। अफसर कब साथ छोड़ देगा यह जानकर ही कर्मचारी काम नहीं करता है, अजीब ऊहा पोह की स्थिति बनी है, कोन कब किसको काटेगा विश्वास नहीं है , यही व्यवस्था, समाज और देश भुगत रहा है, यह भी सही है कि अंधविश्वासियों का दायरा बहुत बड़ गया है, इसी कारण अनेक लोग सब कुछ लुटाकर बैठे है, नेता पर विश्वास करते है वही विश्वासघाती हो रहा है, जिनके दम पर हम बने है उसे ही आँख दिखा रहे है? उनसे मिलने के लिए हम तरस रहे है, अपना दुखड़ा सुनाना चाहते है, कोई सुनना चाहता ही नहीं, एक बार किसी पर विश्वास करने की परीक्षा देने को कोई तैयार नहीं। यह विश्वास समाज मे कैसा आएगा समझ के परे है। मै यह मानता हूँ कि यह एक दिन जरूर आएगा। फिर कृष्ण सुदामा पर विश्वास करेगा। राम का विश्वास सीता पर होगा। अर्जुन भ्रम मे नहीं रहेगा। एक लव्य को गुरु मिल जाएगा। हमारा चुना प्रतिनिधि हमारे लिए काम करेगा। पता नहीं यह समय कब आएगा, किन्तु यह तय है कि इस समय को आना ही है।ओर ये समय आकर रहेगा, विश्वास नही हो तो शायद जिन्दगी   के मायने ही पलट जाये,

रविवार, 19 जून 2016

I love maa and papa

Ma thandi chao hai to Baap ghana dharakht,
Maa ke pairo talay janat ha to Bap k pahlu me janat,
Ma k baghair ghar suuna ha to Bap k bgair zindagi veraan,
Ma mohabat ka darya ha to Baap shafqat ka samandar,
Ma tohfa khuda vandi ha to Baap rehmat khudawandi,
meri Ma mera fakhar ha or mera Baap mera ghurur,
meri Maan meri manzil ha or mera Bap mera rasta,
I love you both ma and baba
Happy fathers day

Me or mere jivan ki badi sachai

pyar nahi paya hai kabhi
har waqt nafrat dekhi hai,
eeto ke is makan me
maine mitti utarti dekhi hai,
chahat ki maine humesha
par nafrat hi payi hai,
pyar ke har ehsas me
maine gali hi khayi hai,
chalta tha main barish me
fir bhi dhup hi payi hai,
na jane kya khel hai bhagwan ka
ki maine jeevan me dukh ki ganga paayi hai,
yaad hai muje bachpan apna
aur pata hai muje jeevan apna
jahan har mod pe kathinayi hai,
rengta sambhalta chalta hu
par fir bhi jaise registaan me khayi hai,
pyar karu to kise kru
ye badi samasya aayi hai,
apne nahi apne hote
to dusro ki kya burayi hai,
apno ne hi muje humesha thukraya
to fir aaj fir se kyu aankh bhar ayi hai,
samajh gya tha salo pehle inke irado ko
fir bhi na jane kyu maine umed aaj bhi lagayi hai,
kehte hai acha karo to acha hoga
bas isi baat pe zindgi maine chalayi hai,
kabhi acha to nahi paya
par dusro ko bohot kuch dene ki koshish ki is baat ki khushi hai,
apno ki nagri me bhi kaisa hai ye jevan
jahan har mod pe azmaish hai,
bethe raho chup chap inke samne to theek
warna rehna inke sath bhi ek sazish hai,
naadan tha main jo maanta tha inhe apna
inhone to apni asli shakal chupayi hai,
kuch nahi kiya inhone jeevan me
bas har ek ko dukh ki ganga pohochayi hai,
sath rehke kar dete hai tanha ye
umra bhar ki ye gehrayi hai,
tum nahi samajh paoge isko
ye mere jevan ki ek sachai hai,

kya ye hi Dosti hoti hai

Viswas ghati nikla vo dost jisase milne me apne har kaam ko chhod kar jaata tha kisi bhi paresani me ho wah uska saath diya karta tha log kahte bhi yah kaisi dosti hai tumhari ki uske pechhe apne har kaam bhol jate ho. me kahta jo paresani dost ka saath nahi deta vah dost nahi kewal ek matlabi hai. par kisi ne kaha socha tha meri paresani me mera wah dost mera sath chhod kar chala jayega. aj bhi wah milta hai par najrai nahi mila pata mujhse mujhe koi gila sikwa nahi usse par use dekh kar uski galti najar aane lagti.us dost ne achi dosti nibhai hai,

शनिवार, 18 जून 2016

Click 10,12 Result

RAJASTHAN BOARD
RESULTS 2016 EXAMS STATISTICS ETC. FOR 2016 EXAMS
Sr.Sec. RL/RWH/Revised Results Exam.2016

Sultan {सुल्तान} Movie

Cast :-
Salman Khan as Sultan Ali Khan Cheema
Anushka Sharma as Aarfa
Randeep Hooda as Sultan’s Coach
Amit Sadh as Sultan’s Brother

Directed By :- Ali Abbas Zafar
Produced By :- Aditya Copra
Release Date :- The film’s schedule to release on
6 July 2016 on Eid.

Sultan is an 2016 upcoming action film, directed by Ali Abbas Zafar and produced by Aditya Chopra.  Salman Khan will play a 40 year old wrestler role in film . The film’s first schedule for release was on Eid 2015 but on the same day Eid Shahrukh Khan’s starrer upcoming film “Raees” is all set to release in theater. Salman going to hit the box office on Diwali 2016. Salman Khan’s Sultan to be shot in Punjab, Delhi, Haryana.
Official Salman Khan’s Sultan directed by Ali Abbas Zafar goes on floor on 15th November 2015 at Punjab followed by a shooting schedule at Delhi and Haryana
The film’s pre-production has started, the lady who is supposed to feature opposite the super star is yet to be finalised.Rumors was that, actress Anushka Sharma is playing role opposite Salman Khan in the film.
Anushka Sharma currently in London for Karan Johar’s next film “Ae Dil Hai Mushkil”.
Anushka confirmed! “Here i’m busy shooting & I read that my next film is sultan!
Sultan is NOT postponed to Diwali 2016. Confirmed for Eid 2016.  Salman Khan’s Sultan Teaser will release
Salman Khan’s starrer much awaited film “Sultan” Release Date Confirmed ! Since Eid falls on Wednesday, 6th July, the film will be releasing on the same day. With this, the film will now enjoy a five day weekend.

शुक्रवार, 17 जून 2016

‘उड़ता पंजाब

 ‘उड़ता पंजाब’ और सीबीएफसी के बीच चले विवाद में पंजाब, गालियां, ड्रग्स और अश्लीलता का इतना जिक्र हुा हे.‘उड़ता पंजाब’ के साथ यह समस्या बनी रहेगी।
‘उड़ता पंजाब’ मुद्दों से सीधे टकराती और उन्हें सामयिक परिप्रेक्ष्य में रखती है। फिल्म की शुरुआत में ही पाकिस्तानी सीमा से किसी खिलाड़ी के हाथों से फेंका गया डिस्क नुमा पैकेट जब भारत में जमीन पर गिरने से पहले पर्दे पर रुकता है और उस पर फिल्म का टायटल उभरता है , यह फिल्म अभिषेक चौबे और संदीप शर्मा के गहरे कंसर्न और लंबे रिसर्च का परिणाम है।
जब आप हिंदी फिल्मों की प्रचलित प्रेम कहानी से अलग जाकर सच्ची घटनाओं और समसामयिक तथ्यों को संवादों और वास्तविक चरित्रों को किरदारों में बदलते हैं तो इस प्रक्रिया में कई नुकीले कोने छूट जाते हें। हो सकता है कि पंजाब के दर्शकों को फिल्म देखते हुए कोई हैरानी नहीं हो, लेकिन बाकी दर्शकों के लिए यह हैरत की बात है। कैसे देश का एक इलाका नशे की गर्त में डूबता जा रहा है और हम उसे नजरअंदाज करना चाहते हैं। बेखबर रहना चाहते हैं।
‘उड़ता पंजाब’ टॉमी सिंह(शाहिद कपूर), बिहारिन मजदूर(आलिया भट्ट), सरताज(दिलजीत दोसांझ), प्रीत सरीन(करीना कपूर खान) और अन्य किरदारों से गुंथी पंजाबी सरजमीन की कहानी है। ‘उड़ता पंजाब’ में सरसों के  खेत और भांगड़ा पर उछलते-कूदते मुंडे और कुडि़यां नहीं हैं। इस फिल्म में हिंदी फिल्मों और पॉपुलर कल्चर से ओझल पंजाब है। ड्रग्स के नशे में डूबा और जागरुक होता पंजाब है। ‘उड़ता पंजाब’ पंजाब की सच्ची झलक पेश करती है। वह निगेटिव या पॉजीटिव से ज्यादा जरूरी है। ‘उड़ता पंजाब’ में अभिषेक चौबे कुछ सीमाओं के साथ सफल रहते हैं। निश्चित ही इसमें उन्हें सहयोगी लेखक संदीप शर्मा, संगीतकार अमित त्रिवेदी, गीतकार शेली, शिवकुमार बटालवी और वरूण ग्रोवर व अन्यि तकनीकी टीम से पूरी मदद मिली है।
शाहिद कपूर ने टॉमी सिंह की उलझनों को अच्छी तरह पर्दे पर उतारा है। शाहिद लगातार किरदारों का आत्मसात करने और उन्हें निभाने में अपनी हदें तोड़ रहे हैं। इस फिल्म में उनका किरदार परिस्थितियों में फंसा और जूझता गायक है, जो लोकप्रियता की खामखयाली में उतराने के बाद खुरदुरी जमीन पर गिरता है तो उसे अपनी गलतियों का अहसास होता है। वह संभलता और अहं व अहंकार से बाहर निकल कर किसी और के लिए पसीजता है। शाहिद कपूर की मेहनत सफल रही है। किरदार की अपनी दुविधाएं हैं, जो लेखक और निर्देशक की भी हैं। बिहारिन मजदूर के रूप में आलिया भट्ट की भाषा और बॉडी लैंग्वेंज की कमियां ईमानदार कोशिश से ढक जाती है।  फिर भी आलिया की इस कोशिश की तारीफ करनी होगी कि वह किरदार में ढलती हैं। दिलजीत दोसांझ पुलिस अधिकारी की भूमिका में सहज और स्वाभाविक हैं। उनके बॉस के रूप में आए कलाकार मानव भी ध्यान खींचते हैं। प्रीत और सरताज की बढ़ती अनुभूतियों और नजदीकियों में भी लेखक-निर्देशक नहीं रमे हैं। यही कारण है कि जब-जब कहानी शाहिद-आलिया के ट्रैक से जब दिलजीत-करीना के ट्रैक पर शिफ्ट करती है तो थोड़ी सी फिसल जाती है।
अच्छी बात है कि ‘उड़ता पंजाब’ में ड्रग्स और नशे को बढ़ावा देने वाले दृश्य नहीं है। डर था कि फिल्म में उसे रोमांटिसाइज न कर दिया गया हो। फिल्म के हर किरदार की व्यथा ड्रग्स के कुप्रभाव के प्रति सचेत करती है। महामारी की तरह फैल चुके नशे के कारोबार में राजनीतिज्ञों, सरकारी महकमों, पुलिस और समाज के आला नागरिकों की मिलीभगत और नासमझी को फिल्म बखूबी रेखांकित और उजागर करती है।
गीत-संगीत ‘उड़ता पंजाब’ का खास चमकदार और उल्लेखनीय पहलू है। अमित त्रिवेदी ने फिल्म की कथाभूमि के अनुरूप संगीत संजोया है। 

आज का विचार

बात उन्ही की होती है जिनमे कोई बात होती है,
इसलिये अपनी काबिलयत भडाओ क्या पता कल आपकी भी बाते इस जमाने मे होने लग जाये,

गुरुवार, 16 जून 2016

अनमोल बाते

कड़वा है मगर सच है :::

1. शेर दिन में 20 घन्टे सोता है अगर मेहनत सफलता की
कुंजी होती तो गधे जंगल के राजा होते।

2.कोई आपको धोखा दें यह उसकी गलती है वही
इन्सान अगर आपको दोबारा धोखा दे तो यह
आपकी गलती है।

3. अच्छी जिन्दगी जीने के दो ही तरीके है् जो पसन्द
है उसे हासिल कर लो
जो हासिल है उसे पसन्द करना सीख लो।

4. दुनिया की सबसे मँहगी चीज है सलाह एक से
माँगो हजारो से मिलती है
और सबसे मँहगा है सहयोग हजारो से माँगो एक से
मिलता है

5.कठीन समय मे समझदार व्यक्ति रास्ता खोजता है
ओर कायर बहाना।

6.झुकता वही है जिसमें जान सोती है अकडना तो
लाश की पहचान होती है।

7.जिसने खरचा(व्यय) कम करने की बात सोची समझ
लो उसने कमाने की अक्ल खो दी।

8.हीरे की काबलियत रखते हो तो अंधेरो में चमका
करो रोशनी में तो काँच भी चमकते है।

9.अपने होसले को ये मत बताओ की तुम्हारी तकलीफ
कितनी. बडी है अपनी तकलीफ को बताओ की
तुम्हारा होंसला कितना बडा है।

10.जिंदगी मे जो हम चाहते है वो आसानी से नही
मिलता लेकिन जिँदगी का सच ये है की हम भी वही
चाहते है जो आसान नही होता।

11आप चाहे कितने भी अच्छे काम करो या कितने भी
इमानदार बनो.,.. पर दुनिया तो आपकी एक गलती
का इन्तजार कर रही है।

12. खुश हूं और सबको खुश रखता हुँ लापरवाह हुँ फिर
भी सबकी परवाह करता हुँ मालुम है कोई मोल नही
मेंरा फिर भी अनमोल लोगो से रिस्ता रखता हु

जीवन मे प्रेम

प्रेम ही जीवन है,
शेष सब मृत्यु है।
जिसने प्रेम जाना
उसने जीवन जाना।
जिसने प्रेम नहीं जाना
उसने सिर्फ मरना जाना।
उसका जीवन सिर्फ
एक लंबा आत्मघात है..
आहिस्ता-आहिस्ता
किया गया।
वह रोज-रोज मरता है,
और कुछ भी नहीं करता।
प्रेम कोई घटना नहीं है।
जो जीवन में घटती है
प्रेम जीवन का ही
दूसरा नाम है।
और जिस दिन तुम्हारे
भीतर यह बोध आ
जाता है कि प्रेम जीवन
का दूसरा नाम है,
तुम्हारे भीतर परमात्मा
नाचने लगता है।
प्रेम
सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
प्रेम से बहुमूल्य
कुछ भी नहीं।
प्रेम जीवन का निचोड़ है,
सार है।
बता ए वुसअते-कौन मकां!
इसको कहां रक्खे।
जरा सा दर्द लेकर आये हैं,
हम उनकी महफिल से।।
प्रेम है परमात्मा की
महफिल की प्रतीति,
कि यह परमात्मा की
मजलिस जमी है,
कि उसकी महफिल है,
कि यह परमात्मा का
सत्संग चल रहा है।
उस बैठक में से,
जो दर्द पैदा हो जाता है,
जो मीठी पीड़ा
पैदा हो जाती है,
प्रभु की प्रतीति से जो
एक मीठा दर्द प्राणों
में फैल जाता है,
वह छोटा-सा दर्द है
और बहुत बड़ा भी!
वह इतना छोटा है कि
तुम्हारे हृदय में समा जाता है
और इतना बड़ा कि सारे
अस्तित्व में भी
समा नहीं सकता है।
प्रेम से बड़ा
कुछ भी नहीं है,
क्योंकि प्रेम में न केवल
प्रेमी समा जाता है,
प्रीतम भी समा जाता है!
प्रेम में परमात्मा
समा जाता है।
प्रेम से बड़ा
कुछ भी नहीं है।
प्रेम को महिमा दो
और प्रेम को जगाओ।
बीज तुम्हारे भीतर है।
बीज वृक्ष बन सकता है।
थोड़ी हिम्मत करो,
चुनौती स्वीकार करो।
!! ओशो !!
[ सहज योग ]

आज का विचार

डर के कभी मत जिओ हमेशा
डट के जिओ

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

भाग्य से ज्यादा कभी नही मिलता

एक सेठ जी थे  -
जिनके पास काफी दौलत थी.
सेठ जी ने अपनी बेटी की शादी एक बड़े घर में की थी.
परन्तु बेटी के भाग्य में सुख न होने के कारण उसका पति जुआरी, शराबी निकल गया. 
जिससे सब धन समाप्त हो गया.

बेटी की यह हालत देखकर सेठानी जी रोज सेठ जी से कहती कि आप दुनिया की मदद करते हो,
मगर अपनी बेटी परेशानी में होते हुए उसकी मदद क्यों नहीं करते हो?

सेठ जी कहते कि
"जब उनका भाग्य उदय होगा तो अपने आप सब मदद करने को तैयार हो जायेंगे..."

एक दिन सेठ जी घर से बाहर गये थे कि, तभी उनका दामाद घर आ गया.
सास ने दामाद का आदर-सत्कार किया और बेटी की मदद करने का विचार उसके मन में आया कि क्यों न मोतीचूर के लड्डूओं में अर्शफिया रख दी जाये...

यह सोचकर सास ने लड्डूओ के बीच में अर्शफिया दबा कर रख दी और दामाद को टीका लगा कर विदा करते समय पांच किलों शुद्ध देशी घी के लड्डू, जिनमे अर्शफिया थी, दिये...

दामाद लड्डू लेकर घर से चला,
दामाद ने सोचा कि इतना वजन कौन लेकर जाये क्यों न यहीं मिठाई की दुकान पर बेच दिये जायें और दामाद ने वह लड्डुयों का पैकेट मिठाई वाले को बेच दिया और पैसे जेब में डालकर चला गया.

उधर सेठ जी बाहर से आये तो उन्होंने सोचा घर के लिये मिठाई की दुकान से मोतीचूर के लड्डू लेता चलू और सेठ जी ने दुकानदार से लड्डू मांगे...मिठाई वाले ने वही लड्डू का पैकेट सेठ जी को वापिस बेच दिया. 

सेठ जी लड्डू लेकर घर आये.. सेठानी ने जब लड्डूओ का वही पैकेट देखा तो सेठानी ने लड्डू फोडकर देखे, अर्शफिया देख कर अपना माथा पीट लिया.
सेठानी ने सेठ जी को दामाद के आने से लेकर जाने तक और लड्डुओं में अर्शफिया छिपाने की बात कह डाली...

सेठ जी बोले कि भाग्यवान मैंनें पहले ही समझाया था कि अभी उनका भाग्य नहीं जागा...
देखा मोहरें ना तो दामाद के भाग्य में थी और न ही मिठाई वाले के भाग्य में...

इसलिये कहते हैं कि भाग्य से
ज्यादा
और...
समय
से पहले न किसी को कुछ मिला है और न मीलेगा!ईसी लिये ईशवर जितना दे उसी मै संतोष करो...
झूला जितना पीछे जाता है, उतना ही आगे आता है।एकदम बराबर।
सुख और दुख दोनों ही जीवन में बराबर आते हैं।

जिंदगी का झूला पीछे जाए, तो डरो मत, वह आगे भी आएगा।

बहुत ही खूबसूरत लाईनें.

.किसी की मजबूरियाँ पे न हँसिये,
कोई मजबूरियाँ ख़रीद कर नहीं लाता..!

डरिये वक़्त की मार से,बुरा वक़्त किसीको बताकर नही आता..!

अकल कितनी भी तेज ह़ो,नसीब के बिना नही जीत सकती..!
बीरबल अकलमंद होने के बावजूद,कभी बादशाह नही बन सका...!!

""ना तुम अपने आप को गले लगा सकते हो, ना ही तुम अपने कंधे पर सर रखकर रो सकते हो एक दूसरे के लिये जीने का नाम ही जिंदगी है!

इसलिये वक़्त उन्हें दो जो तुम्हे चाहते हों दिल से!

रिश्ते पैसो के मोहताज़ नहीं होते क्योकि कुछ रिश्ते मुनाफा नहीं देते पर जीवन अमीर जरूर बना देते है !!! "

मुस्कराते रहो

फूलो की तरह
      मुस्कुराते रहिये ...

भंवरों की तरह
      गुनगुनाते रहिये ...

चुप रहने से रिश्ते भी
      उदास हो जाते है ...

कुछ उनकी सुनिये
      कुछ अपनी सुनाते रहिये..

भूल जाइये शिकवे शिकायतों
      के पलों को ...

और ...

छोटी छोटी खुशियों के
      मोती लुटाते रहिये ...

वक्त

☣☣☣☣☣☣☣☣☣

"समझ नही आता जिंदगी तेरा
फैसला"...!!!!

"एक तरफ तू केहती है"
"सबर का फल मिठा
होता है"...

"और दूसरी तरफ केहती है"
"वक्त किसी का इंतजार नही करता"...

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

ज्ञान की बात

एक बार एक कुत्ते और गधे के बीच शर्त लगी कि जो जल्दी से जल्दी दौडते हुए दो गाँव आगे रखे एक सिंहासन पर बैठेगा...
वही उस सिंहासन का अधिकारी माना जायेगा, और राज करेगा.

जैसा कि निश्चित हुआ था, दौड शुरू हुई.

कुत्ते को पूरा विश्वास था कि मैं ही जीतूंगा.

क्योंकि ज़ाहिर है इस गधे से तो मैं तेज ही दौडूंगा.

पर अागे किस्मत में क्या लिखा है ... ये कुत्ते को मालूम ही नही था.

शर्त शुरू हुई .

कुत्ता तेजी से दौडने लगा.

पर थोडा ही आगे गया न गया था कि अगली गली के कुत्तों ने उसे लपकना ,नोंचना ,भौंकना शुरू किया.

और ऐसा हर गली, हर चौराहे पर होता रहा..

जैसे तैसे कुत्ता हांफते हांफते सिंहासन के पास पहुंचा..

तो देखता क्या है कि गधा पहले ही से सिंहासन पर विराजमान है.

तो क्या...!  
   गधा उसके पहले ही वहां पंहुच चुका था... ?

और शर्त जीत कर वह राजा बन चुका था.. !

और ये देखकर

निराश हो चुका कुत्ता बोल पडा..

अगर मेरे ही लोगों ने मुझे आज पीछे न खींचा होता तो आज ये गधा इस सिंहासन पर न बैठा होता ...

तात्पर्य ...

१. अपने लोगों को काॅन्फिडेंस में लो.

२. अपनों को आगे बढने का मौका दो,  उन्हें मदद करो.

३. नही तो कल बाहरी गधे हम पर राज करने लगेंगे.

४. पक्का विचार और आत्म परीक्षण करो.

⭐जो मित्र आगे रहकर होटल के बिल का पेमेंट करतें हैं, वो उनके पास खूब पैसा है इसलिये नही ... ⭐

⭐बल्कि इसलिये.. कि उन्हें मित्र  पैसों से अधिक प्रिय हैं ⭐

⭐ऐसा नही है कि जो हर काम में आगे रहतें हैं वे मूर्ख होते हैं, बल्कि उन्हें अपनी जवाबदारी का एहसास हरदम बना रहता है इसलिये  ⭐

⭐जो लडाई हो चुकने पर पहले क्षमा मांग लेतें हैं, वो इसलिये नही, कि वे गलत थे... बल्कि उन्हें अपने लोगों की परवाह होती है इसलिये.⭐

⭐जो तुम्हे मदद करने के लिये आगे आतें हैं वो तुम्हारा उनपर कोई कर्ज बाकी है इसलिये नही... बल्कि वे तुम्हें अपना मानतें हैं इसलिये

( आत्मचिंतन करने योग्य पोस्ट है )

कृष्ण रूकमणी संवाद

एक दिन रुक्मणी ने भोजन के बाद,
श्री कृष्ण को दूध पीने को दिया।

दूध ज्यदा गरम होने के कारण
श्री कृष्ण के हृदय में लगा
और
उनके श्रीमुख से निकला-
" हे राधे ! "

सुनते ही रुक्मणी बोली-
प्रभु !
ऐसा क्या है राधा जी में,
जो आपकी हर साँस पर उनका ही नाम होता है ?

मैं भी तो आपसे अपार प्रेम करती हूँ...
फिर भी,
आप हमें नहीं पुकारते !!

श्री कृष्ण ने कहा -देवी !
आप कभी राधा से मिली हैं ?
और मंद मंद मुस्काने लगे...

अगले दिन रुक्मणी राधाजी से मिलने उनके महल में पहुंची ।

राधाजी के कक्ष के बाहर अत्यंत खूबसूरत स्त्री को देखा...
और,
उनके मुख पर तेज होने कारण उसने सोचा कि-
ये ही राधाजी है और उनके चरण छुने लगी !

तभी वो बोली -आप कौन हैं ?

तब रुक्मणी ने अपना परिचय दिया और आने का कारण बताया...

तब वो बोली-
मैं तो राधा जी की दासी हूँ।

राधाजी तो सात द्वार के बाद आपको मिलेंगी !!

रुक्मणी ने सातो द्वार पार किये...
और,
हर द्वार पर एक से एक सुन्दर और तेजवान दासी को देख सोच रही थी क़ि-
अगर उनकी दासियाँ इतनी रूपवान हैं...
तो,
राधारानी स्वयं कैसी होंगी ?

सोचते हुए राधाजी के कक्ष में पहुंची...

कक्ष में राधा जी को देखा-
अत्यंत रूपवान तेजस्वी जिसका मुख सूर्य से भी तेज चमक रहा था।
रुक्मणी सहसा ही उनके चरणों में गिर पड़ी...

पर,
ये क्या राधा जी के पुरे शरीर पर तो छाले पड़े हुए है !

रुक्मणी ने पूछा-
देवी आपके  शरीर पे ये छाले कैसे ?

तब राधा जी ने कहा-
देवी !
कल आपने कृष्णजी को जो दूध दिया...
वो ज्यदा गरम था !

जिससे उनके ह्रदय पर छाले पड गए...
और,
उनके ह्रदय में तो सदैव मेरा ही वास होता है..!!

इसलिए कहा जाता है-

बसना हो तो...
'ह्रदय' में बसो किसी के..!

'दिमाग' में तो..
लोग खुद ही बसा लेते है..!!

              

श्री श्याम

सावरें!!

मेंरी मोहब्बत बेजुबां होती
रही!!!

दिल की धड़कने अपना वजूद
खोती रही!!

आपके सिवा कोई
नही आया दुख मे करीब ,

एक आपकी क्रपा की बारिश थी
जो मेरे साथ रोती रही!!!

प्रेम से काहिये जय श्री श्याम !!

माचिस की तिलि

एक जैसी ही दिखती थी.. माचिस की वो तीलियाँ..
कुछ ने दिये जलाये.. और कुछ ने घर..!!

कुछ ने महकाई अगरबतियां मन्दिरों में,
तो कुछ ने सुलगाये सिगरेट के कश...!!

कँही गरमाया चूल्हा और बनी रोटियाँ,
तो कँही फ़टे बम्ब और बिखरी बोटियाँ..!!

जली कँही शादी में बन हवनकुंड की अगन,
तो फूँकी गयी दहेज़ की कमी से कोई सुहागन..!!

काजल कभी नवजात शिशु का बनाया,
तो शमशान में किसी चिता को जलाया..!!

जला आग ठिठुरती ठण्ड में गरीब को बचाया,
तो बन के बॉन फायर कभी रईसों को रिझाया..!!

एक सी दिखती थी माचिस की वो तीलियाँ पर,
सभी ने अपना एक अलग ही रंग दिखाया..!!

मारवाडी कविता

कड़ै रै माँ की गोदी खूगी
काँधे खूगे बाबू के""
.
मांगे धनपत लखमीचन्द के,,,
सांग देखण जाया करते...
ब्याह सगाई रिश्ते,,,
नाई बामण करकै आया करते...
नीम जाल के रूखां पै चढ़,,,
पील नींबोली खाया करते...
बाबू छो मै आजाता तो,,,
दिखै दामण मैं लुक जाया करते...
डंडा बित्ती डला लकोई,,,
खेल होवैं थे जादू के...
कड़ै रै माँ की गोदी खूगी,,,
खूगे कांधे बाबू के...
.
ब्याह शादी मैं बानै बिठाणा,,,
ला ला कै मटणा नुहाणा...
भाभी पै श्याही घलवाणा,,,
रूसे कुण्बे नै मनाणा...
गाल मैं बैठ पत्तल पै खाणा,,,
नाई कै वो मोड़ बंधाणा...
बनड़े कै फेर तेल चढ़ाणा,,,
बुआ भाण का मंगल गाणा...
साइज़ छोटे बणगे रै इन,,,
भातियां आले लाडू के...
कड़ै रै माँ की गोदी खूगी,,,
खूगे कांधे बाबू के...
.
कुणबा कठ्ठा होकै नै,,,
फेर करण लामणी जाणा रै...
रैड़ू गाडी भर कै लाण की,,,
गेर पैर मैं गाणा रै...
ल्याकै तिपाई चढ़ ऊपर,,,
फेर छाबड़ी ले बरसाणा रै...
भूरली तारण खातर उसपै,,,
मांझण का लहराणा रै...
टूटी जूती पाटा कुरता,,,
बटण टूट रे बाजू के,,,
कड़ै रै माँ की गोदी खूगी,,,
खूगे कांधे बाबू के...
.
चार पहर तै पहले उठ कै,,,
हल जोड़ कै भाणा रै...
ठा कै झाला घाल ज्वारा,,,
रोटी ले कै जाणा रै...
घी के पीपे भरे रवैं थे,,,
शक्कर गेल्यां खाणा रै...
म्हैंस खोल पहल्यां नै झोड़ पै,,,
गोते मार नहणा रै...
आग लाग गी म्हैंस भाज गी,,,
खागे गेहूं # छाजू के...
कड़ै रै माँ की गोदी खूगी,,,
खूगे कांधे बाबू के...
.
बणा कै टोली धर कै दोघड़,,,
गीत गांदी जाया करती...
तड़कै सांझा गालां के मैं,,,
रोणक सी बण जाया करती...
होक्का भर कै बैठ गये,,,
ओड़ै बात ज्ञान की पाया करती...
ब्याही थ्याही नई भोड़िया,,,
घूंघट मैं शरमाया करती...
सामण कातक फागण के वै,,,
गीत गांदी भादू के...
कड़ै रै माँ की गोदी खूगी,,,
खूगे कांधे बाबू के...
.
कोहणी कै बंधी नेजू बाल्टी,,,
कुवे पै पनिहारी देखी...
सीपी चिमटा पलटा बेचती,,,
हामनै गाडे लुहारी देखी...
कापण कुलिया मटका बिलोणी,,,
दाणा मैं देंदी कुम्हारी देखी...
Rohilla Ji नै या,,,
बदलती दुनियादारी देखी...
कोए कहे की मानै ना,,,
यें बालक रहे ना काबू के...
कड़ै रै माँ की गोदी खूगी,,,
खूगे कांधे बाबू के...।।

रविवार, 17 अप्रैल 2016

दिमाग से संम्बंन्धित रोचक तथ्य

1. जब आप जाग रहे होते है तब आपका दिमाग 10 से 23 वाट तक की बिजली उर्जा छोड़ता है जो कि एक बिजली के बल्ब को भी चला सकती है.
2. मनुष्य के दिमाग में दर्द की कोई भी नस नही होती इसलिए वह कोई दर्द नही महसूस नही करता.
3. हमारा दिमाग 75% से ज्यादा पानी से बना होता है.
4. आपका दिमाग 5 साल की उम्र तक 95% बढ़ता है और 18 तक पहुँचते-पहुँचते 100% विकसित हो जाता है ओर उसके बाद बढ़ना रूक जाता है.
5. एक गर्भवती महिला के दिमाग के न्युरॉनज़ की गिणती 2,50,000 न्युरॅान प्रति मिनट के हिसाब से बढ़ती है.
6. आप अपने दिमाग में न्युरॉनज़ की गिणती दिमागी क्रियाएँ करके बढ़ा सकते हैं क्योंकि शरीर के जिस भी भाग की हम ज्यादा उपयोग करते है वह और विकसित होता जाता है.
7. पढ़ने और बोलने से एक बच्चो का दिमागी विकास ज्यादा होता है.
8. जब आप एक आदमी का चेहरा गौर से देखते है तो आप अपने दिमाग का दायां भाग उपयोग करते है.
9. हमारे शरीर के भिन्न हिस्सों से सुचना भिन्न रफतार से और भिन्न न्युरॉन के द्वारा हमारे दिमाग तक पहुँचती है. सारे न्युरॅान एक जैसे नही होते कई ऐसे न्युरॅान भी होते है जो सुचना को0.5 मीटर प्रति सैकेंड की रफतार से दिमाग तक पहुँचाते है और कई ऐसे भी होते है जो सुचना को 120 मीटर प्रति सैकेंड की रफतार से दिमाग तक पहुँचाते है.
10. आपके दिमाग की Right side आपकी body के left side को जबकि दिमाग की left side आपकी body के Right side को कंट्रोल करती है.
11. जो बच्चे पाँच साल का होने से पहले दो भाषाएँ सीखते है उनके दिमाग की संरचना थोड़ी सी बदल जाती है.
12. आप के दिमाग में हर दिन औसतन 60,000 विचार आते हैं.
13. अकसर ऐसा कहा जाता है कि हम दिन में 20,000 बार पल्क झपकते है और इसके कारण हम दिन में 30 मिनट तक अंन्धे रहते हैं. पर असल में हम दिन में 20,000 बार पलक जरूर झपकते है पर 30 मिनट तक अन्धे नही रहते. क्योंकि हमारा दिमाग इतने कम समय में वस्तु का चित्र अपने आप बनाए रखता है. हमारे पलक झपकने का समय 1 सैकेंड के 16वे हिस्से से कम होता है पर दिमाग किसी भी वस्तु का चित्र सैकेंड के 16वे तक बनाए रखता है.
14. हँसते समय हमारे दिमाग के लगभग 5 हिस्से एक साथ कार्य करते हैं.
15. दिमाग का आकार और वजन दिमागी शक्ती पर कोई प्रभाव नही डालता . Albert Einstein के दिमाग का वजन 1230 ग्राम था जो कि सामान्य मनुष्य से कहीं कम था.
16. एक जिन्दा दिमाग बहुत नर्म होता है और इसे चाकु से आसानी से काटा जा सकता है.
17. दिमाग में 1,00,000 मील लंम्बी रक्त वाहिकाएँ होती हैं.
18. दिमाग को 4 से 6 मिनट तक ऑक्सीजन न मिलने पर भी यह रह सकता है पर 5 मे 10 मिनट तक न मिलने पर brain damage पक्की है.
19. मनुष्य का दिमाग का वजन लगभग 1500 ग्राम तक होता है.
20. हमारे दिमाग में न्युरॅान की गिणती 100 अरब ( जितने आकाशगंगा में तारे होते है) होते हैं और हर न्युरॅान में 1,000 से 10,000 synopses होते है.
21. दिमाग का सतही क्षेत्रफल लगभग 1,500 से 3,000 वर्ग सैटीमीटर तक होता है.
22. वैज्ञानिक मानते हैं कि ब्रह्माण्ड में सबसे जटिल और रहस्मई चीज मनुष्य का दिमाग है.
23. हैलमेट पहनकर दिमाग को चोट लगने की संम्भावना फिर भी 80% रहती ही है.
24. मानव दिमाग के अंदर एक सैकेंड में 1 लाख रसायनिक प्रतिक्रियायें होती हैं.
25. दिमाग शरीर का सबसे ज्यादा चर्बी वाला अंग है.
26. मस्तिष्क में प्रत्येक वस्तु (सूचना) संग्रहित होते जाता है – तकनीकी रूप से मस्तिष्क के पास अनुभव, अवलोकन, पठन, श्रवण आदि प्रत्येक वस्तु (सूचना) को संग्रह करने की क्षमता होती है। जन्म के बाद से प्रत्येक वस्तु उसमें संग्रहित होते जाती है, कुछ भी नहीं छूटता। यह अलग बात है कि मनुष्य में अपने ही मस्तिष्क में सग्रहित किसी अनेक वस्तुओं (सूचनाओं) तक वापस पहुँचने याने कि अनेक घटनाओं को स्मरण रख पाने की क्षमता नहीं होती।
27. दिमाग शरीर का लगभग 2% है परन्तु यह कुल ऑक्सीजन का 20% खपत करता है और खून भी 20% उपयोग करता हैं.
28. जब मनुष्य दो साल का होता है तो उसके दिमाग में किसी और समय के इलावा Brains cells की गिणती सबसे ज्यादा होती है.
29. दिमाग के बारे में सबसे पहला उल्लेख 6000 साल पहले सुमेर से मिलता है.
30. सोधो से पता चला है कि पुरूषों और महिलायों के दिमाग की संरचना भिन्न होती है.
31. अगर हमारी चमड़ी और मेहदे की तरह हमारे दिमाग के cell भी बदल जाए तो हम अपनी याददाशत गवा सकते हैं.
32. मनुष्य के दिमाग की left side बोलने को कंटरोल करती है और पंक्षियों के दिमाग की left side उनकी चहचहाना कंटरोल करती है.
33. मनुष्य दिन की अपेक्षा रात को ज्यादा बढ़ते हैं. यह दिमाग के एक छोटे से भाग pituiary ग्रंथी के कारण होती है जो रात को सोते समय एक बढ़ने वाला हारमोन छोड़ती है.
34. बजन के लिहाज से अब तक सबसे भारी दिमाग एक रूसी लेखक ‘Ivan turgenew’ का था. उसके दिमाग का वजन लगभग 2.5 किलो था और उसकी मृत्यु 1883 में हुई थी.
35. दिमाग में 40% भाग का रंग grey है और 60% भाग का रंग सफेद है. grey भाग में न्युरॉन होते है जो संचार का काम करता हैं.
36. 30 साल की आयु के बाद हमारा दिमाग सुकड़ने लगता है.
37. अगर शरीर के आकार को ध्यान में रखा जाए तो मनुष्य का दिमाग सभी प्रणीयों से बड़ा हैं. हाथी के दिमाग का आकार उसके शरीर के मुकाबले सिर्फ 0.15% होती है जबकि मनुष्य का 2 प्रतीशत.
38. मानव का दिमाग computer से भी ज्यादा तेज प्रतिक्रिया करता है.
39. आपका अवचेतन मन(दिमाग) आपके चेतन मन से 30,000 गुना शक्तिशाली होता है.