गुरुवार, 16 जून 2016

जीवन मे प्रेम

प्रेम ही जीवन है,
शेष सब मृत्यु है।
जिसने प्रेम जाना
उसने जीवन जाना।
जिसने प्रेम नहीं जाना
उसने सिर्फ मरना जाना।
उसका जीवन सिर्फ
एक लंबा आत्मघात है..
आहिस्ता-आहिस्ता
किया गया।
वह रोज-रोज मरता है,
और कुछ भी नहीं करता।
प्रेम कोई घटना नहीं है।
जो जीवन में घटती है
प्रेम जीवन का ही
दूसरा नाम है।
और जिस दिन तुम्हारे
भीतर यह बोध आ
जाता है कि प्रेम जीवन
का दूसरा नाम है,
तुम्हारे भीतर परमात्मा
नाचने लगता है।
प्रेम
सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
प्रेम से बहुमूल्य
कुछ भी नहीं।
प्रेम जीवन का निचोड़ है,
सार है।
बता ए वुसअते-कौन मकां!
इसको कहां रक्खे।
जरा सा दर्द लेकर आये हैं,
हम उनकी महफिल से।।
प्रेम है परमात्मा की
महफिल की प्रतीति,
कि यह परमात्मा की
मजलिस जमी है,
कि उसकी महफिल है,
कि यह परमात्मा का
सत्संग चल रहा है।
उस बैठक में से,
जो दर्द पैदा हो जाता है,
जो मीठी पीड़ा
पैदा हो जाती है,
प्रभु की प्रतीति से जो
एक मीठा दर्द प्राणों
में फैल जाता है,
वह छोटा-सा दर्द है
और बहुत बड़ा भी!
वह इतना छोटा है कि
तुम्हारे हृदय में समा जाता है
और इतना बड़ा कि सारे
अस्तित्व में भी
समा नहीं सकता है।
प्रेम से बड़ा
कुछ भी नहीं है,
क्योंकि प्रेम में न केवल
प्रेमी समा जाता है,
प्रीतम भी समा जाता है!
प्रेम में परमात्मा
समा जाता है।
प्रेम से बड़ा
कुछ भी नहीं है।
प्रेम को महिमा दो
और प्रेम को जगाओ।
बीज तुम्हारे भीतर है।
बीज वृक्ष बन सकता है।
थोड़ी हिम्मत करो,
चुनौती स्वीकार करो।
!! ओशो !!
[ सहज योग ]

कोई टिप्पणी नहीं: