रविवार, 17 अप्रैल 2016

वरद हुई शारदा जी हमारी

वरद हुई शारदा जी हमारी,
पहनी वसंत की माला संवारी ।
लोक विशोक हुए, आंखों से
उमड़े गगन लाखों पांखों से,
कोयलें मंजरी की शाखों से,
गाएं सुमंगल होली तुम्हारी ।
नाचे मयूर प्रात के फूटे
पात के मेघ तले, सुख लूटे,
कामिनी के मन मूठ से छूटे,
मिलने खिलने की ललकी निवारी !

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