जब सौंदर्य कम होता है,
तो आभूषणों की जरूरत होती है;
जब सौंदर्य परिपूर्ण होता है,
तो न आभूषणों की जरूरत होती है,
न साज—शृंगार की।
जब सौंदर्य परिपूर्ण होता है,
तो आभूषण सौंदर्य में बाधा बन जाते हैं,
खटकते हैं।
तब तो सादापन ही अति सुंदर होता है,
तब तो सादेपन में ही लावण्य होता है,
प्रसाद होता है।
तो जो मात्रा, छंद,
व्याकरण, भाषा को बिठाने में लगे रहते हैं,
उनके इतने आयोजन का
कारण ही यही होता है कि
भाव पर्याप्त नहीं है,
भाषा से उसकी पूर्ति करनी है।
जब भाव ही पर्याप्त होता है,
तो भाषा से पूर्ति नहीं करनी होती।
जब भाव बहता है बाढ़ की तरह,
तो किसी भी तरह की भाषा काम दे देती है।
भाषा पर मत जाना, भाव पर जाना।
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मंगलवार, 12 अप्रैल 2016
!! भाषा और भाव!!
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