यह शरीर एक बीज है।
और जीवन, चेतना और
आत्मा का एक अंकुर भीतर है।
लेकिन हम इस खोल को ही बीज
समझकर नष्ट हो जाते हैं और
वह अंकुर पैदा भी नहीं हो पाता है,
वह अंकुर फूट भी नहीं पाता है।
जब वह अंकुर फूटता है,
तो जीवन का अनुभव होता है।
जब वह अंकुर फूटता है,
तो मनुष्य का बीज होना
समाप्त होता है
और मनुष्य वृक्ष बनता है।
जब तक मनुष्य बीज है,
तब तक वह सिर्फ एक पोटेंशियलिटी है,
एक संभावना है।
और जब उसके भीतर वृक्ष पैदा होता है जीवन का,
तब वह वास्तविक बनता है।
उस वास्तविकता को कोई आत्मा कहता है,
उस वास्तविकता को कोई परमात्मा कहता है।
मनुष्य है बीज परमात्मा का।
मनुष्य सिर्फ बीज है।
जीवन का पूर्ण अनुभव तो वृक्ष को होगा,
बीज को क्या हो सकता है?
बीज क्या जान सकता है वृक्ष के आनंद को?
बीज क्या जान सकता है कि आएंगे पत्ते हरे,
जिन पर सूरज की किरणें नाचेगी?
बीज क्या जान सकता है कि हवाएं बहेंगी
पत्तियों और शाखाओं से
और प्राण संगीत में गूंजेंगे?
बीज कैसे जान सकता है कि खिलेंगे फूल
और आकाश के तारों को मात कर देंगे?
बीज कैसे जान सकता है कि
पक्षी गीत गाएंगे और
यात्री छाया में विश्राम करेंगे?
बीज कैसे जान सकता है?
वृक्ष के अनुभव को बीज कैसे जान सकता है?
बीज को तो कुछ भी पता नहीं।
वह तो सपना भी नहीं देख सकता उसका,
जो वृक्ष होने पर संभव होगा।
वह तो वृक्ष होकर ही जाना जा सकता है।
आदमी जीवन को नहीं जानता है,
क्योंकि उसने बीज को ही अपनी परिपूर्णता समझ ली है।
वह तो जीवन को तभी जानेगा
, जब भीतर के जीवन का पूरा वृक्ष प्रकट हो।
-मैं मृत्यु सिखाता हूं–(प्रवचन–1)
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मंगलवार, 12 अप्रैल 2016
!! बीज से वृक्ष! !
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